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इंसान कितना भी आगे क्यों न  निकल जाए, पर प्राकृतिक शक्तियों तक वो पहुंच नहीं सकता। कुछ कारनामें ऐसे भी हुए हैं, जिनपर कोई विश्वास तक नहीं कर सकता। पर वो हुए हैं, इसलिए लोगों को मानना पड़ता है। ऐसी ही एक चमत्कारिक जगह है राजस्थान में, जिसपर हजारों तोप के गोले बरसाए गए, पर उसका कुछ नहीं बिगड़ा।
 जी हां जैसलमेर में भारत-पाकिस्ताान सीमा के पास स्थित तनोट राय माता मंदिर में 1965 और 1971 की लड़ाई के दौरान पाकिस्तारन द्वारा कई बार बम फेंके गए लेकिन हर बार उसे असफलता ही हाथ लगी। आज भी मंदिर के संग्रहालय में पाकिस्तान द्वारा दागे गए जीवित बम रखे हुए हैं।  
इंसानों के बनाए हथियारों से भगवान को नुकसान पहुंचाने का शायद ही कोई दुस्सा हस कर सकता है। ऐसी हिमाकत पाकिस्तानन ने की थी वो भी एक-दो नहीं बल्कि हजारों बार, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। जी हां, जैसलमेर के थार रेगिस्तान में 120 किमी. दूर सीमा के पास स्थित सिद्ध तनोट राय माता मंदिर से भारत-पाकिस्तान युद्ध की कई यादें जुड़ी हुई हैं। 
राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना को परास्त करने में तनोट माता की भूमिका बड़ी अहम मानी जाती है। यहां तक मान्यता यह  है कि युद्ध के दौरान तनोट राय माता ने भारतीय सैनिकों की मदद की इसके चलते ही पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा। 
साल 1965 में हुए भारत-पाक युद्ध के दौरान 17 से 19 नवंबर तक पाकिस्तान की ओर से तनोट राय माता मंदिर पर भारी बमबारी की गई। दुश्मन की तोप जबर्दस्त आग उगलती रहीं। लड़ाई के दौरान पाकिस्तान की तरफ से गिराए गए करीब 3000 बम भी इस मंदिर में खरोच तक नहीं ला सके, यहां तक कि मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे भी नहीं।
माना जाता है कि तनोट माता के आशीर्वाद से ही ऐसा हुआ। उस दौरान तनोट राय माता की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियां दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थीं।
कब्जा करने के उद्देश्य से पाकिस्तान ने भारत के इस हिस्से पर जबर्दस्त हमले किए लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। अब तक गुमनाम रहा यह स्थान युद्ध के बाद प्रसिद्ध हो गया। ज्ञात हो कि पाकिस्ताएन सेना 4 किमी. अंदर तक भारतीय सीमा में घुस आई थी। लेकिन भारतीय सेना ने जवाबी हमले में पाकिस्तानी सेना को काफी नुकसान पहुंचाया और वह पीछे लौट गई।
माता का मन्दिर जो अब तक सुरक्षा बलों का कवच बना रहा, युद्ध समाप्त् होने पर सुरक्षा बल इसका कवच बन गए। मंदिर को बीएसएफ ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
आज यहां का सारा प्रबन्ध सीमा सुरक्षा बल के हाथों में है। मन्दिर के अन्दर ही एक संग्रहालय है जिसमें वे गोले भी रखे हुए हैं। पुजारी भी सैनिक ही है। यह मंदिर भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के फौजियों के लिए भी आस्था का केन्द्र रहा है।

यह घटना तब की है  6 मार्च 1752 AD,  लाहौर (वर्तमान में पाकिस्तान) के गवर्नर मुईन उल मालिक, जिसे मीर मन्नू के नाम से भी जाना जाता है, ने उस क्षेत्र के सिखों को जान से मारने और उनकी छोटी जवान कुंवारी बेटियों को जिहादियों में बांटने का आदेश दिया | औरतों और बच्चों की सजा दूसरी तय की जानी थी जिसके लिए उन्हें भूखे प्यासे लाहौर के कारागार में बंद रखा गया था | औरतों को इस्लाम कबूल करने अथवा ना करने की सूरत में गम्भीर परिणाम भुगतने की सजा सुनाई गयी | जब इन औरतों ने मौत को सामने देखकर भी झुकना स्वीकार नहीं किया तब इस मुस्लिम सैनकों ने उनके 300 मासूम बच्चों की हत्या कर दी और उनकी लाशों को भालों की नोक पर टांग दिया गया।  यही नहीं, उन हैवानों ने बच्चों की अंतड़ियां काट कर शरीर के दूसरे हिस्से भी बाहर निकाल दिए और उनकी माला बनाकर उन माताओं के गले में पहना दिया।  

एक के बाद एक, हर सिख महिला ने मुसलमानों के ऐसे नृशंश अत्याचार सहे, लेकिन किसी ने भी उनके आगे झुककर इस्लाम स्वीकार नहीं किया | यह एक चमत्कार ही कहा जायेगा, जब तक वे मुग़ल सैनिक इन औरतों की हत्या कर पाते, सिख घुड़सवार अकालियों ने 4 नवंबर 1753 को हमला कर मीर मन्नू को मार डाला और इन महिलाओं को बचाने में कामयाब हो गए | पूरे पंजाब क्षेत्र में मुगलों द्वारा ऐसे घिनौने कार्यों के हज़ारों उदाहरण मिल जायेंगे जो सिखों ने नहीं बल्कि खुद मुग़ल इतिहासकारों ने लिखे हैं | इनमें से एक नूर अहमद चिस्ती लिखता है, ” मीर मन्नू ने एक मुस्लिम त्यौहार के दिन बहादुरी से 1100 सिखों का सर, धड़ से अलग कर दिया था।”
हैरानी की बात यह है, इन घटनाओं के दो सदियाँ बीत जाने के बाद भी इराक और सीरिया जैसे देशों में ये मुसलमान हज़ारों की संख्या में यहूदी औरतों और बच्चों को मार रहे हैं। ये मुसलमान दूसरे धर्म के लोगों को काफिर कहते हैं और खुद के द्वारा की जाने वाली हत्याओं को भी कुरान ए शरीफ से जोड़ देते हैं | मीर मन्नू ने जिन औरतों के बच्चों की हत्या की थी वे माएं क्या चाहती तो इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकती थीं ? वे औरतें सिख धर्म को लेकर अंधी नहीं थी जिसकी वजह से उन्हें अपने बच्चों को खोना पड़ा। उन्होंने बलिदान की जो मिसाल दी वह इतिहास में सिख धर्म के सिद्धांतों की रक्षा के लिए किया गया सबसे बड़ा संघर्ष है जिसमे सैकड़ों जाने गंवानी पड़ीं थी 
सिखों ने जो संघर्ष किया अथवा बलिदान दिया उसका एकमात्र लक्ष्य किसी भी सूरत में भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार को रोकना था | उस ज़माने में भी सिख, इस्लाम के खतरनाक इरादों को मानवता के प्रति नफरत की भावना को समझ चुके थे | इस्लाम के घृणा भरे विचारों को रोकने का एकमात्र जरिया, किसी भी सूरत में इस्लाम को स्वीकार नहीं करना था, जो उन औरतों ने किया | इस्लामिक जिहाद के आगे दुनिया की कई ताकतवर सभ्यताएं भी दम तोड़ चुकी थीं | अगर भारत ने वैसा प्रतिरोध नहीं दिखाया होता तो अब तक या तो सारे काफिर मार दिए गए होते या इस्लाम में धर्मान्तरित किये जा चुके होते | भारत के कई दूसरे लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए इस्लाम को स्वीकार कर लिया और चोरी चुपके, घर के अंदर छिपकर हिन्दू या दूसरे धर्मों का निर्वाह किया करते थे |
समय के साथ इन छिपे हुए “काफिरों” ने इस्लाम में अपनी आस्था ज्यादा बढ़ा ली और आगे चलकर पाकिस्तान को जन्म दिया, वह देश जो आज दुनिया का सबसे बड़ा आंतकवाद उत्पादक देश है | हालाँकि हिन्दू से धर्मांतरित हुए पाकिस्तानी मुसलमान, कई पीढ़ियों तक होली दीवाली जैसे हिन्दू त्यौहार मनाते रहे और कई पाकिस्तानी आज भी हिन्दू सरनेम लगते हुए देखे जा सकते हैं | यदि कोई हिन्दू अपना धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनता है तो ये मुसलमान ख़ुशी के मारे ऐसा शोर मचाते हैं मानों इस्लाम के सच्चे होने का प्रमाण दे रहे हों |
यह उन औरतों के त्याग और बलिदान का ही परिणाम है कि जो पंजाब मुगलों के साम्राज्य और उनके आक्रमणों से सबसे ज्यादा प्रभावित था, सं 1800 तक महाराजा रणजीत सिंह द्वारा शासित हो गया | रणजीत सिंह ने जिहाद के नाम पर बनायीं गयी मस्जिदों को तोड़कर तथा अज़ान के समय सड़कों पर होने वाले मुसलमानों के मार्च पर रोक लगाकर भारत में इस्लाम के प्रसार को रोक दिया | यह उन्हीं की देन है कि आज आधे से ज्यादा पंजाब, या यूँ कहें तो उत्तर भारत में इस्लाम बिलकुल भी नहीं है |

हमारे देश भारत में  हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान  शिव वो देव हैं जिन्हें देव की उपाधि भी मिली और साधू सा वैराग्य भी. इस संसार को चलाने वाले अगर विष्णु कहे जाते हैं तो शिव संसार को बैलेंस करते हैं.शिव वो है जो संसार की बुराई से जूझता है, शिव वो है जो जीवन की कठिनाइयों के विष को अमृत समझ कर पी जाता है, शिव वो है जो ‘नीलकंठ’ कहलाता है.

वो मद मस्त है, वो चिंता न कर भी चिंतन कर पाता है, वो निश्छल है, निष्कपट है, तभी तो ‘
बम भोले’ कहलाता है.दुनिया भर में जितने भी शिव भक्त हैं, आपने उन्हें शिव का नाम लेते हुए, ‘भांग’ का सेवन करते हुए देखा और सुना होगा. कई लोग ये तर्क देते हैं, कि शिव भी भांग पीते थे, इसलिए हम भी उनकी तरह बनेंगे, भांग पिएंगे.

भांग पुराने समय से यूज़ की जा रही एक ऐसी ड्रिंक है, जिसे हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ‘भगवान के अमृत’ की उपाधि हासिल है. भांग से कई बीमारियों का इलाज संभव है और ये गंभीर चोटों को ठीक करने में सक्षम है. वेदों में भांग को एक ‘Medicinal Plant’ बताया गया है, जो ‘5 पवित्र पौधों में से एक है’.

एक व्यक्ति ने इसका बड़ा अच्छा उदाहरण दिया है कि:जिस तरह सूर्य बिना दूषित हुए मूत्र में से भी पानी खींच लेता है, उसी तरह शिव भी बिना रुके विष के सागर को अपने अंदर समा सकते हैं.वो इतने शक्तिशाली हैं कि भांग या चिलम पी सकते हैं, लेकिन अपना होश कभी नहीं खोएंगे.

कई अघोरी चिलम भांग का सेवन करते हैं, क्योंकि ये माना जाता है कि इससे दिमाग को केंद्रित करने और ध्यानमग्न होने में सहायता मिलती है. हर योगी शिव जैसा बनना चाहता है, लेकिन शिव परम योगी हैं. सवाल ये उठता है कि शिव भांग क्यों पीते थे या इसके पीछे क्या कारण रहा है:

देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से जो विष निकला, उससे पृथ्वी पर हाहाकार मच गया, इस विष को पीने वाले शिव थे. लेकिन उन्होंने विष को निगला नहीं, बल्कि उसे कंठ में रख दिया, इसलिए वो नीलकंठ कहलाये. ये विष इतना गर्म था कि इससे शिव को बहुत गर्मी हो गयी और फिर उन्हें कैलाश भेजा गया, जहां तापमान हमेशा 0 डिग्री रहता है. शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाने का महत्व भी इसलिए है क्योंकि ये ठंडा होता है. ऐसा ही कुछ भांग या चिलम के बारे में भी कहा जाता है. साइंस के नज़रिये से देखने पर आपको ये पता चलेगा कि भांग ‘Coolant’ का काम करता है.

वेदों के अनुसार समुद्र मंथन से एक बूंद मद्र पर्वत पर गिरने से एक पौधा उगा. इस पौधे का रस देवताओं को इतना पसंद आया कि उन्होंने इसका सेवन करना शुरू कर दिया. और बाद में शिव इसे हिमालय में ले आये ताकि हर कोई इसका सेवन कर सके.

भांग को गंगा की बहन कहा जाता है और ये हमेशा गंगा के किनारे ही उगती है. इसीलिए भांग को शिव की जटा पर बसी गंगा के बगल में जगह मिली है.

कहा जाता है कि देवता हमेशा सोमरस का सेवन करते थे और इसी को पाने के लिए असुरों ने उनसे लड़ाई की थी. ये माना जाता है कि सोमरस और भांग दोनों एक ही हैं. हालांकि इस बात की अभी कोई पुष्टि नहीं की गयी है

शिव हमेशा ध्यान में रहते थे, और भांग ध्यान केंद्रित करने के लिए जानी जाती है. इससे वो हमेशा परमानंद में रहते थे और कभी भी ध्यान लगा सकते थे. यही कारण है की कई योगी, अघोरी और साधू चिलम और भांग पीते हैं, ताकि वो भी और अच्छे से ध्यान लगा सकें.

ये सब वो बाते  थीं, जो शिव के भांग पीने से  जुड़ी हैं. इनकी प्रमाणिकता के बारे में किसी को भी ढंग से नहीं पता, लेकिन भगवान  शिव के भांग पीने से ज़्यादा ज़रूरी उनके जीवन को समझना है. भांग उनके जीवन का पहलू कही जा सकती है. भगवान शिव  अभी और भी चमत्कारी बातें  है जिनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करनी की आवश्यकता है 

भारत में भगवान विष्णु के अनेको अद्भुत मंदिर है इन्ही अद्भुत मंदिर में से एक है 'राजीवलोचन मंदिर'। यह मंदिर छत्तीसगढ़ में महानदी तट पर स्थित है। महानदी, पैरी तथा सोंढूर नदी का यहाँ संगम होने के कारण छत्तीसगढ़ का यह स्थान त्रिवणी संगम कहलाता है।
इस मंदिर में साक्षात स्वयं भगवान विष्णु रात्रि में विश्राम करने आते है जिसका प्रमाण है मंदिर के अंदर पलंग पर बिछाई गई चादर में आई सलवटे व तेल से भरी कटोरी का खाली मिलना है।
मंदिर के पुजारी हर रोज रात्रि के समय मंदिर के गेट पर ताला लगाने से पहले मंदिर के अंदर भगवान विष्णु के विश्राम के लिए रखी गई पलंग के समाने एक कटोरे में तेल भर कर रखते है।
जब सवेरे मंदिर का गेट खोला जाता है तो पलंग के सामने रखा कटोरा खाली मिलता है तथा पलंग के पर बिछी चादर पर सलवटे पड़ी हुई होती है जिसमे तेल के छोटे छोटे धब्बे दिखाई देते है। जैसे किसी ने रात्रि के समय मंदिर में प्रवेश किया हो, पलंग पर लेटा हो वहां रखे तेल से अपनी मालिश की हो। मंदिर के पुजारी और लोगो का मानना है की स्वयं भगवान विष्णु यहाँ आते है तथा मालिश करते है इसके बाद वे यही शयन करते है।
मंदिर में होने वाले इस चमत्कार की वास्तविकता की जाँच हेतु कई लोगो ने मंदिर के गेट के बाहर पहरा दिया तथा मंदिर के गेट में हर रोज ताले लगाए जाते है परन्तु हर बार सुबह मंदिर में पलंग पर सलवटे देखने को मिलती है साथ ही तेल का भरा कटोरा खाली मिलता 
यहाँ पर भगवान विष्णु राजिव लोचम के नाम से जाने जाते है तथा उनके नाम पर ही इस तीर्थ का नाम राजीव लोचम पड़ा है।

ये है भारत के वो शहीद जो गुमनामी हो गए आजादी के बाद


जिस प्रकार  लोगों को सिर्फ़ महल की खूबसूरती, उसके शानदार छज्जे और सिर्फ़ डिज़ाइन दिखाई देता है, लेकिन जिन नींव के पत्थरों पर वो मकान टिका हुआ हैं वो किसी को नहीं दिखाई देते। सब शानदार छज्जे और बाहरी दिखावा बनना चाहते हैं, कोई बिरला ही होता है जो नींव का पत्थर बनता है। उसी प्रकार  हिन्दुस्तान के क्रान्तिकारी उलट थे जिन्होंने देश के आजादी के लिए बलिदान दिया पर किसी को याद नहीं रहे वो  , वो सब नींव के पत्थर ही बनना चाहते थे। जानिए कुछ ऐसे ही क्रान्तिकारियों के बारे में जो गुमनामी में खो गए।

जिनमे से एक थी  दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। 19 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गाभाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थीं। पर दुःख की बात है की आज के भारतीय उन्हें भूल गए किसी को उनका नाम भी नहीं पता,  दुर्गा भाभी थी कौन क्या योगदान रहा उनका आजादी के इस लड़ाई में भगत सिंह तो याद रहे लेकिन दुर्गा भाभी किसी को याद नहीं रही। .. 


बात उस समय  की है  धरती पर जब मानव सभ्यता का जन्म हुआ, तब  इंसान को कुछ समझ नहीं थी. लेकिन धीरे-धीरे इंसान ने सिर छुपाने के लिए छत का निर्माण किया, जिसकी  उस समय सबसे ज्यादा  आवश्यकता थी. उस समय बरसात से खुद को बचाने के लिए इंसान ने  कच्चे घर बनाए. फिर धीरे-धीरे पक्की इमारतों का निर्माण होने लगा. उसके बाद घर बनाने की कला यानि वास्तुकला में पारंगत होने के बाद उसने बेहद खूबसूरत इमारतों को बनाने के लिए कला और संस्कृति का सहारा लिया. उस प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक बेहद खूबसूरत और आकर्षक इमारतें बनाईं. पूरी दुनिया में ऐसी कई इमारतें हैं, जो अपनी वास्तुकला और खूबसूरती के कारण लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई।   आज हम आपको ऐसी ही कुछ इमारतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी खूबसूरत वास्तुकला के बल पर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. साथ ही इन इमारतों की छतों पर की गई चित्रकारी, नक़्क़ाशी और कलाकृति बहुत ही सुन्दर है. जिसको देखने  के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.


पाकिस्तान में बना यह एड सोशल मीडिया पर हो रहा है वायरल

रमजा़न को इस्लाम में सबसे पाक महीना माना जाता है. रमज़ान की मूल भावना को अगर आप समझना चाहते हैं, तो आपको Surf Excel के इस नये विज्ञापन को ज़रूर देखना चाहिए, जो पाकिस्तान में बना है

Surf Excel Pakistan ने हाल ही में इस्लामिक पाक महीने रमज़ान को लेकर एक विज्ञापन जारी किया है, जिसमें रमज़ान में खुशियां मनाने और मदद करने की भावना को दिखाया गया है.इस विज्ञापन को Vasan Bala ने निर्देशित किया है. इस Ad को अपलोड करते ही मात्र तीन घंटे में इसे 4000 से अधिक बार शेयर किया गया.


सोशल मीडिया और वीडियो गेम के जमाने में हम आज अपने परम्परागत खेलों को शायद भूल गये हैं. मगर आज भी हमारे ग्रामीण क्षेत्रों ने कई पुराने खेलों को सहेज कर रखा है. इन खेलों में से एक है, चौसर. चौसर हमारे देश के सबसे प्राचीन खेलों में से एक है. यह खेल बिसात पर चार रंगों की चार-चार गोटियों और तीन पासों से खेला जाता है. भोलेनाथ को थी चौसर में विशेष रुचि


 सबसे पहले द्रौपदी का हुआ पतन 

पांडव जब स्वर्ग जाने के लिए निकले तो रास्ते में ही द्रौपदी सहित भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव की मृत्यु हो गई। सिर्फ युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग जा पाए। ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन युधिष्ठिर के अलावा अन्य पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु क्यों हुई, ये बात बहुत कम लोगों को पता है। आज हम आपको बता रहे हैं युधिष्ठिर कैसे पहुंचे सशरीर स्वर्ग और रास्ते में ही क्यों हो गई द्रौपदी व अन्य पांडवों की मृत्यु?

भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद महर्षि वेदव्यास की बात मानकर द्रौपदी सहित पांडवों ने राज-पाठ त्याग कर सशरीर स्वर्ग जाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। इसके बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। पांडवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। पांडवों ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की। यात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए




15 मई 2016 , नई दिल्ली । हिन्दू धर्मीय गाय को पूज्य मानते हैं, माता मानते हैं । तब भी गोदरेज समूह के अध्यक्ष अदी गोदरेज ने  गोमांसभक्षण का समर्थन करते हुए निष्कारण अंग्रेजों की दास बनी अपनी बुद्धि दिखाकर कहा है कि ‘वैदिक काल में भारतीय गोमांस खाते थे । हिन्दू धर्म में बीफ का कहीं भी विरोध नहीं है ।’ वेदों में अनेक स्थानों पर  गोमांसभक्षण की केवल निंदा ही नहीं की गई है, अपितु गोहत्या करनेवालों को कठोर दंड बताया है । गोदरेज पारसी समाज के हैं । पारसी धर्मग्रंथ ‘अवेस्ता’ के ‘यस्न, ३८.८’ की दूसरी पंक्ति में ‘गाय, बैल, तथा बछडे के मांस का भक्षण वर्ज्य कहा गया है । इसलिए केवल व्यवसायिक दृष्टीकोण सामने रखकर जानबूझकर करोडों हिन्दुआें के श्रद्धास्थान गोमाता के विषय में अपमानजनक वक्तव्य कर हिन्दुआें की धार्मिक भावनाएं आहत की हैं । इसलिए अदी गोदरेज पर कठोर कानूनी कार्यवाही की जाए तथा हिन्दू मन्दिरों के गर्भगृह में स्त्रियों को प्रवेश देने के विषय में शासन तथा न्यायालय परस्पर धर्मपरंपरा भंग न करते हुए हिन्दू धर्म के शंकराचार्य अथवा काशी विद्वत परिषद के मार्गदर्शन में यह निर्णय लें । ये मांगे करते हुए सुबह १० से दोपहर १२ बजे दिल्ली के जंतर मंतर पर  ‘राष्ट्रीय हिन्दू आंदोलन’ किया गया , जिसमें सनातन संस्था, वैदिक उपासना पीठ, योग वेदांत सेवा समिति और हिंदू जनजागृति समिति के कार्यकर्ता सम्मिलित हुए ।

     गोदरेज केवल मद्य-मांसविक्री करनेवाले उद्योगपतियों की टंकियां भरने के लिए ही इस प्रकार का विधान कर रहे हैं । देश के उद्योगों की चिंता करनेवाले गोदरेज नेे देश को धोखा देकर ९ सहस्र करोड रुपए लूटनेवाले मद्यसम्राट विजय मल्ल्या के विषय में मुंह क्यों बंद रखा है ? गोहत्या के कारण हिन्दू संस्कृति का नाश हो रहा है । गोदरेज को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि देश के आर्थिक विकास सहित हिन्दू संस्कृति की रक्षा और संवर्धन होना भी आवश्यक है । इसलिए हिन्दुआें की भावनाआें का आदर कर गोदरेज को हिन्दुआें की सार्वजनिक क्षमा मांगनी चाहिए अन्यथा हिन्दू गोदरेज समूह के सभी उत्पादनों का बहिष्कार करें, ऐसा आवाहन भी इस समय हिन्दुत्वनिष्ठों ने किया ।

* इस समय की गई अन्य मांगें ....

. देहली विश्‍वविद्यालय की पाठ्यपुस्तक में हुतात्मा भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सूर्यसेन आदि क्रांतिकारियों को ‘आतंकवादी’ सिद्ध करनेवाले सर्व संबंधितों पर राष्ट्रपुरुषों का घोर अपमान करने के लिए अपराध प्रविष्ट करें ।

. ‘भूमाता ब्रिगेड’ जैसे धर्मविरोधी संगठनों के मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने हेतु धर्मविरोधी आंदोलन कर रहे हैं । ये आंदोलन राजनैतिक अवसरवादिता और प्रसिद्ध होने की लालसा के लिए किए जा रहे हैं । इसलिए ऐसे  प्रसिद्धीलोलुप आंदोलन कर सामाजिक शांति भंग करनेवाले पुरोगामियों पर कठोर कानूनी कार्यवाही की जाए ।
     
                                                     
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